एडवोकेट यूनियन फॉर डेमोक्रेसी एंड सोशल जस्टिस नामक संस्था द्वारा मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका क्रमांक 8967/2024 दायर कर प्रदेश में ओबीसी वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिए जाने की राहत मांगी गई है।
उक्त याचिका की 11 बार सुनवाई होने के बावजूद भी मध्य प्रदेश सरकार ने जवाब दाखिल नहीं किया और न ही उक्त याचिका को सुप्रीम कोर्ट में स्थानांतरित कराने हेतु ट्रांसफर याचिका दायर की गई। हाई कोर्ट में जवाब दाखिल करने के लिए मध्य प्रदेश सरकार को आखिरी मौका दिया है।
उक्त याचिका की दिनांक 02/04/2025 को मुख्य न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत तथा विवेक जैन की खंडपीठ द्वारा ग्यारहवीं सुनवाई की गई। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक प्रसाद शाह ने कोर्ट को बताया कि 2011 की जनगणना के अनुसार, मध्य प्रदेश में एससी की 15.6%, एसटी की 21.14%, ओबीसी की 50.9%, और मुस्लिम की 3.7% आबादी है। अर्थात, 91.34% आबादी इन वर्गों की है, शेष 8.66% अनारक्षित वर्ग की जनसंख्या है। प्रदेश में एससी को 16%, एसटी को 20%, ओबीसी को 14% (13% विवादित), और सामान्य/अनारक्षित वर्ग को 10% आरक्षण दिया गया है। मध्य प्रदेश सरकार जानबूझकर ओबीसी वर्ग के साथ घोर अन्याय कर रही है। प्रदेश में ओबीसी वर्ग की आबादी 51% से अधिक है, जिसे जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण दिया जाना सामाजिक न्याय की अवधारणा को साकार करने के उद्देश्य से आवश्यक है।
मध्य प्रदेश में ओबीसी बेरोजगार कृत्रिम भेदभाव का सामना कर रहे हैं
कोर्ट को यह भी बताया गया कि इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट समस्त राज्यों को निर्देशित कर चुका है कि ओबीसी वर्ग को निर्धारित मापदंडों के आधार पर पहचान कर उनकी सामाजिक, आर्थिक, और शैक्षणिक स्थितियों का नियमित रूप से परीक्षण करने हेतु स्थायी रूप से आयोग गठित किए जाएं। लेकिन मध्य प्रदेश में रामजी महाजन आयोग के बाद से आज दिनांक तक सरकारों ने ओबीसी वर्ग की स्थिति सुधारने में कोई रुचि नहीं दिखाई। सरकार के उक्त असंवैधानिक कृत्य से ओबीसी वर्ग के युवा व्यापक पैमाने पर सरकार द्वारा उत्पन्न कृत्रिम भेदभाव का सामना कर रहे हैं। प्रदेश में सभी वर्गों को जनसंख्या के अनुपात से भी अधिक आरक्षण दिया गया है, सिर्फ ओबीसी वर्ग के हितों का संरक्षण नहीं किया जा रहा है। उक्त प्रकरण की लगभग एक दर्जन सुनवाई के बावजूद भी सरकार जवाब दाखिल नहीं कर रही है।
देश का एकमात्र राज्य तमिलनाडु है, जो ओबीसी वर्ग को जनसंख्या के अनुपात में 50% आरक्षण दे रहा है। उक्त राज्य में 69% आरक्षण लागू है, जिसे सुप्रीम कोर्ट भी अनुमति दे चुका है। लेकिन मध्य प्रदेश राज्य सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का गलत अर्थान्वयन कर रही है।
उक्त समस्त तर्कों को कोर्ट ने बहुत गंभीरता से लेते हुए सरकार को जवाब हेतु दो सप्ताह का आखिरी मौका दिया और यदि दो सप्ताह के अंदर जवाब नहीं दिया गया, तो 15 हजार रुपये के जुर्माने के साथ जवाब दाखिल करना होगा। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर एवं विनायक प्रसाद शाह ने पक्ष रखा।